एकादशी व्रत का पारण: हरिवासर में क्यों नहीं खोलते उपवास? जानें नियम
एकादशी व्रत का संपूर्ण फल पाने के लिए पारण का सही समय और हरिवासर के सख्त नियमों का पालन अनिवार्य माना जाता है।
सनातन परंपरा में एकादशी उपवास को सभी व्रतों में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जितना महत्व इस उपवास को रखने का है, उतना ही आवश्यक इसके समापन का सही विधान भी है। उपवास समाप्त करने की इस निर्धारित प्रक्रिया को एकादशी व्रत का पारण कहा जाता है।
शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश है कि यदि पारण सही विधि और तय समय सीमा में न किया जाए, तो उपवास रखने का पूर्ण पुण्य फल प्राप्त नहीं होता। व्रती के लिए आवश्यक है कि वह द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले ही भोजन ग्रहण कर उपवास खोले।
हरिवासर के दौरान पारण की सख्त मनाही
पारण के संदर्भ में सबसे कड़ा नियम हरिवासर को लेकर माना गया है। द्वादशी तिथि की पहली एक-चौथाई अवधि को धार्मिक ग्रंथों में हरिवासर की संज्ञा दी गई है। इस विशिष्ट समयावधि में उपवास खोलना पूरी तरह वर्जित रहता है।
धार्मिक विधानों के अनुसार, हरिवासर समाप्त होने के पश्चात ही अन्न या जल ग्रहण कर व्रत का समापन करना चाहिए। मान्यता है कि हरिवासर काल में व्रत खोलने से पुण्य क्षीण हो जाता है, इसलिए पंचांग में हरिवासर समाप्त होने का समय अवश्य देखना चाहिए।
गलत समय पर पारण करने से लगने वाले दोष
शास्त्रों के अनुसार, सूर्योदय से पूर्व अथवा गलत समय पर उपवास तोड़ना दोषपूर्ण माना जाता है। यदि कोई साधक बिना सही समय देखे अथवा द्वादशी तिथि बीत जाने के बाद पारण करता है, तो उसे व्रत के अभीष्ट फल की प्राप्ति नहीं होती।
यदि किसी विशेष परिस्थिति में द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो रही हो, तब भी पारण सूर्योदय के बाद ही करने का शास्त्रीय नियम है। ऐसी स्थिति में केवल जल अथवा तुलसी दल ग्रहण करके पारण का संकल्प पूरा किया जाता है।
मुख्य बातें एक नज़र में
- एकादशी व्रत का समापन सदैव द्वादशी तिथि के भीतर करना अनिवार्य है।
- द्वादशी तिथि की प्रारंभिक एक-चौथाई अवधि हरिवासर कहलाती है, जिसमें पारण वर्जित है।
- पारण के लिए प्रातःकाल का समय, विशेषकर हरिवासर बीतने के बाद का पहर, सर्वोत्तम माना जाता है।
- मध्याह्न यानी दोपहर के समय उपवास खोलना शास्त्रों में निषिद्ध माना गया है।
- गलत समय अथवा तिथि समाप्त होने के बाद पारण करने से उपवास का फल नष्ट होता है।
- पारण की थाली में तामसिक भोजन पूरी तरह वर्जित रहता है और सात्विक आहार ही ग्राह्य है।
पारण की सही थाली और जरूरी सावधानियां
पारण करते समय केवल समय का ही नहीं, बल्कि आहार की शुद्धता का भी ध्यान रखना आवश्यक होता है। एकादशी व्रत का पारण सात्विक भोजन से ही किया जाता है। भोजन में लहसुन, प्याज या भारी तले-भुने पदार्थों का उपयोग नहीं होना चाहिए।
उपवास खोलने से पूर्व भगवान विष्णु का ध्यान करना, ब्राह्मण या जरूरतमंद को दान देना और तुलसी दल युक्त चरणामृत ग्रहण करना शुभ माना जाता है। इन नियमों के पालन से ही एकादशी साधना विधिवत संपन्न होती है।





