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हनुमान अंश के सुनील लोधी का तंबूरा: एक फल से बनता है ये अनोखा वाद्य यंत्र

27 सितंबर 2026 178 1 मिनट
हनुमान अंश के सुनील लोधी का तंबूरा: एक फल से बनता है ये अनोखा वाद्य यंत्र

फिल्म 'हनुमान अंश' में अपने गीत से मशहूर हुए सुनील लोधी का तंबूरा एक विशेष फल से तैयार होता है, जो बुंदेली संस्कृति का प्रतीक है।

फिल्म 'हनुमान अंश' में अपने गीतों से देशभर में पहचान बनाने वाले लोक कलाकार सुनील लोधी के साथ हमेशा एक खास वाद्य यंत्र दिखाई देता है। यह यंत्र, जिसे तंबूरा कहा जाता है, अब दर्शकों के बीच चर्चा का विषय बन गया है। इसकी सबसे अनोखी बात यह है कि यह किसी लकड़ी या धातु से नहीं, बल्कि एक विशेष फल से बनाया जाता है।

बुंदेलखंड की सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा रहा यह तंबूरा, इस क्षेत्र की लोक कला और संगीत परंपरा को जीवंत रखता है। सुनील लोधी इसे अपनी हर प्रस्तुति में शामिल करते हैं, जिससे यह न केवल उनके संगीत का, बल्कि उनकी पहचान का भी अभिन्न अंग बन गया है।

कैसे तैयार होता है यह अनोखा तंबूरा?

इस तंबूरे को बनाने की प्रक्रिया बेहद दिलचस्प और पारंपरिक है। यह मुख्य रूप से 'तुंबा' नामक एक बड़े और गोल फल से तैयार किया जाता है। तुंबा के फल को पेड़ से तोड़ने के बाद उसे सावधानी से सुखाया जाता है ताकि उसकी बाहरी परत मजबूत हो जाए।

सूखने के बाद फल के अंदर का गूदा निकाल दिया जाता है और खोखले हिस्से को साफ किया जाता है। इसके बाद एक लकड़ी की डंडी इसमें लगाई जाती है और उस पर तार कसे जाते हैं। यह पूरी प्रक्रिया हस्तनिर्मित होती है, जिसमें कारीगरों की विशेष कला और अनुभव की आवश्यकता होती है।

बुंदेली संस्कृति का अहम हिस्सा

तंबूरा केवल एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि बुंदेली संस्कृति का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। स्थानीय जानकार दामोदर अग्निहोत्री बताते हैं कि इसे बनाने की कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। यह लोकगीतों, भजनों और पारंपरिक नृत्यों में प्रमुखता से इस्तेमाल होता है, जो इस क्षेत्र की आत्मा को दर्शाता है।

कलाकार सुनील लोधी ने इस वाद्य यंत्र को राष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाई है, जिससे बुंदेलखंड की इस अनूठी कला को एक नई दिशा मिली है। उनका प्रयास है कि यह पारंपरिक कला जीवित रहे और युवा पीढ़ी भी इससे जुड़े।

मुख्य बातें एक नज़र में

  • सुनील लोधी का तंबूरा 'हनुमान अंश' फिल्म के बाद चर्चा में आया।
  • यह वाद्य यंत्र 'तुंबा' नामक एक विशेष फल से बनता है।
  • तंबूरा बुंदेलखंड की लोक संस्कृति और संगीत का प्रतीक है।
  • इसे बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह हस्तनिर्मित और पारंपरिक है।
  • फल को सुखाकर, खोखला कर और तार कसकर इसे तैयार किया जाता है।
  • यह लोकगीतों और भजनों में प्रमुखता से उपयोग होता है।

स्थानीय कलाकारों के लिए प्रेरणा

सुनील लोधी की सफलता ने बुंदेलखंड के अन्य लोक कलाकारों को भी प्रेरित किया है। उनके माध्यम से यह संदेश गया है कि अपनी जड़ों से जुड़कर और पारंपरिक कला को आधुनिक मंच पर प्रस्तुत करके भी पहचान बनाई जा सकती है। यह स्थानीय कला और कलाकारों के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन है।

इस तंबूरे की धुनें न केवल कानों को भाती हैं, बल्कि यह बुंदेलखंड की मिट्टी की खुशबू और उसकी समृद्ध परंपरा को भी महसूस कराती हैं। यह दिखाता है कि कैसे साधारण चीजों से भी असाधारण कला का सृजन किया जा सकता है।

निष्कर्ष

सुनील लोधी का तंबूरा सिर्फ एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की कला, संस्कृति और परंपरा का जीवंत उदाहरण है। यह दर्शाता है कि कैसे एक साधारण फल से बना यह उपकरण लोक कला को दूर-दूर तक पहुंचाने का माध्यम बन सकता है। उम्मीद है कि यह अनोखा वाद्य यंत्र और इसे बनाने की कला आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।

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